राहुल गांधी PM मोदी से क्यों डरते हैं?

राहुल गांधी PM मोदी से क्यों डरते हैं? Representational AI-generated Image
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 राहुल गांधी PM मोदी से क्यों डरते हैं?

राहुल गांधी ने गौतम अडानी रिश्वत कांड और अमेरिकी व्यापार सौदे के विवाद के बीच नरेंद्र मोदी पर लगाया ‘देश बेचने’ का आरोप

By Rakesh Raman
नई दिल्ली | 25 फरवरी, 2026

1. “समझौतावादी” प्रधानमंत्री: व्यापार सौदे पर राहुल गांधी के आरोप: फरवरी 2026 के संसदीय सत्र के दौरान, विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तीखा हमला करते हुए उन पर “राष्ट्रीय बिक्री” (National Sell-out) का आरोप लगाया है। गांधी का दावा है कि मोदी सरकार ने बाहरी दबाव में आकर एक गुप्त अमेरिकी व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, जिससे देश की संप्रभुता के साथ समझौता हुआ है। उनका आरोप है कि इस सौदे के माध्यम से प्रधानमंत्री ने राष्ट्रीय डेटा, भारतीय कपड़ा उद्योग और किसान समुदाय के हितों को बाहरी शक्तियों को सौंप दिया है। राहुल गांधी ने मोदी की छवि को एक “समझौतावादी” नेता के रूप में पेश करने की कोशिश की है।

2. अडानी-मोदी सांठगांठ: SEC का मुकदमा और वैश्विक रिश्वतखोरी के आरोप: राजनीतिक विवाद तब अंतरराष्ट्रीय कानूनी वास्तविकता में बदल गया जब 30 जनवरी, 2026 को अमेरिकी प्रतिभूति और विनिमय आयोग (SEC) ने गौतम अडानी पर नागरिक धोखाधड़ी का मुकदमा दर्ज किया। SEC का आरोप है कि अडानी ने सौर ऊर्जा अनुबंध प्राप्त करने के लिए भारतीय सरकारी अधिकारियों को करोड़ों डॉलर की रिश्वत देने की योजना बनाई और 2021 के ऋण प्रस्ताव के दौरान अमेरिकी निवेशकों को गुमराह किया। राहुल गांधी ने तर्क दिया कि अडानी के खिलाफ यह मामला वास्तव में “मोदी जी पर मामला” है, क्योंकि अमेरिकी कानूनी प्रक्रिया इस राजनीतिक फंडिंग के पीछे के छिपे तंत्र को उजागर कर सकती है। उन्होंने SEBI और प्रवर्तन निदेशालय (ED) जैसी भारतीय नियामक संस्थाओं की चुप्पी पर भी सवाल उठाए।

3. संसदीय गतिरोध और सैन्य संस्मरणों का दमन: लोकसभा के भीतर, सरकार और विपक्ष के बीच भारी घर्षण के कारण कार्यवाही पूरी तरह से ठप हो गई है। सदन में राहुल गांधी को पूर्व सेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे के संस्मरण (विशेषकर चीन सीमा मुद्दे पर) और “एपस्टीन फाइल्स” का संदर्भ देने से रोक दिया गया। सरकार ने इन विषयों को प्रक्रियात्मक रूप से अमान्य घोषित कर दिया, जिसे विपक्ष ने “संस्थागत कब्जे” (institutional capture) का प्रमाण बताया है।

4. स्मोकस्क्रीन 2026 शोध: प्रदर्शन बनाम सड़क का संघर्ष: “स्मोकस्क्रीन 2026” नामक एक शोध रिपोर्ट में इस राजनीतिक गतिरोध का विश्लेषण किया गया है। रिपोर्ट का तर्क है कि राहुल गांधी का “सामयिक आक्रोश” केवल डिजिटल माध्यमों और ट्विटर तक सीमित है और वह इसे एक बड़े जन आंदोलन में बदलने में विफल रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, ईवीएम (EVM) के खिलाफ सड़कों पर उतरे बिना और चुनावी प्रक्रिया को चुनौती दिए बिना, मोदी का सत्ता ढांचा चुनावी रूप से अडिग बना हुआ है।

5. संस्थागत बाधाएं और विपक्ष की चुनौतियां: लेख में यह भी उल्लेख किया गया है कि विपक्ष के कड़े आंदोलन न करने के पीछे कानूनी और व्यक्तिगत भय एक बड़ा कारण हो सकता है। राहुल गांधी और सोनिया गांधी नेशनल हेराल्ड मामले जैसे कानूनी मुकदमों में उलझे हुए हैं। इसके अतिरिक्त, शोध में सत्ता के अन्य विरोधियों के साथ हुई “रहस्यमय परिस्थितियों” (जैसे विमान दुर्घटनाएं या स्वास्थ्य विफलताएं) का भी जिक्र किया गया है, जो विपक्ष की चुनौती देने की क्षमता को जटिल बनाती हैं।

निष्कर्ष के तौर पर, लेख कहता है कि यदि राहुल गांधी केवल प्रतीकात्मक बयानों (जैसे “बब्बर शेर” की बयानबाजी) तक सीमित रहते हैं और वास्तविक भौतिक प्रतिरोध नहीं करते, तो भारत की लोकतांत्रिक जवाबदेही और संप्रभुता में गिरावट जारी रहेगी।

By Rakesh Raman, who is a national award-winning journalist and social activist. He is the founder of a humanitarian organization RMN Foundation which is working in diverse areas to help the disadvantaged and distressed people in the society.

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